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इस मोड़ से जाते हैं..

Written by on May 23, 2019

इस मोड़ से जाते हैं..

कभी कभी ज़िन्दगी ऐसे मोड़ पर ला कर खड़ा कर देती है जहाँ सब कुछ रुक जाता है… थम जाता है ! आज कुछ ऐसा ही हुवा…. सिडनी के एक नुसिंग होम में अपने एक रेडियो लिसनर को मिलने गया…

पिछले पांच महीने से फ़ोन पर बात होती थी पर जाने का वक़्त नहीं निकाल पा रहा था…शुकरवार सुबहा रेडियो शो के बाद ठान ली की आज चाहे कितना भी व्यस्त रहूँ मिलने ज़रूर जाऊँगा !

फ़ोन किया… की बता दूं.. आ रहा हूँ, पर उनका फ़ोन स्विचड ऑफ था ! दोपहर लगभग एक बजे वंहा पहुंचा, रिसेप्शन पर कोई नहीं था.. साथ ही के एक बड़े हाल में देखा… लगभग बीस बाईस बजुर्ग अपनी अपनी कुर्सी पर सुस्ता रहे थे…शायद लंच के बाद झपकी लगा रहे थे…. पहली बार लगा के अकेलापन क्या होता है ! आसपास काफी लोग थे लेकिन चेहरों पर एक अजीब सा खालीपन था… कुछ नज़रें मेरी तरफ उठी… ना-उम्मीद भरी…बाकी शायद बेखबर थे या उन्हें कोई भी फरक नहीं पड़ता था… की कौन आ रहा है या जा रहा है!

बहुत से सवाल ज़हन में आ रहे थे… तभी रिसेप्शनिस्ट आ गई…जिसने मुझे मेरे लिसनर मित्र के रूम का रास्ता बताया ! कोरिडोर पार करके दूसरी तरफ जाना था… कोरिडोर के दोनों तरफ कमरे थे..उत्सुकता के साथ मेरी नज़रे कमरों में जा रही थी.. कुछ लोग लंच के बाद सो रहे थे.. कुछ अभी अभी नहा धो कर अपने बेड पर बैठ कर कहीं खोये हुवे थे.. जो लोग डाइनिंग रूम में जा कर खाना नही खा सकते, अटेंडेंट उन्हें खाना खिला रहे थे.. बहुत से सवालों का जवाब ढूँढ़ते में अपने मित्र के दरवाजे पर पहुंचा.. जो बंद था.. सोचा शायद वो सो रहीं हो… थोड़ी हिचकिचाहट के बाद मैने दरवाजा खटखटाया.. कुछ देर बाद दरवाजा खुला.. सामने हमारे रेडियो मित्र थे… दो बार पहेल भी उनसे मिला था…

एकदम पहचान लिया उन्होंने … पहेले तो उन्हें विश्वास ही नही हुवा.. फिर एक ठाहाके के साथ बोलीं “ठाकुर” विश्वास नहीं हो रहा की आप मिलने आओगे… फिर एक जादू की जफ्फी दी … चेहरे पे वही ज़िन्दाद्ली औरे आवाज़ में वही खनक !
कद की वो थोड़े छोटी है… ऐसा लगा थोडा और झुक गई है.. लेकिन इरादों में और बातों में बहोत उंचा कद है उनका ! एक और बजुर्ग लेडी के साथ वो रूम शेयर करती है जो अपने बेड पर कहीं दूर खोयी थी.. मेरी तरफ उसने देखा भी नहीं ! विश्वास नहीं हुवा……कोई इतना बेखबर भी हो सकता है ….. डरते हुवे अपने रेडियो मित्र से पुछा ….में इनको डिस्टर्ब तो नही कर रहा हूँ… तो पता चला के उनको डिप्रेशन हुवा है…वो किसी से भी बात नहीं करती…

अब हम दोनों को जोर जोर से बात करने की आदत है…..थोडा अटपटा लग रहा था…. मैने कहा आज बहार मौसम अच्छा है….सर्दियों का आख़री वीकेंड है और बाहारें आ चुकी है.. चलों बाहर थोडा घूमेंगे और फिर धूप में बैठते है..
फिर क्या था..हमारी मित्र ने ज़ल्दी से अपनी शाल उठाई ….फिर अचानक उन्हें कुछ याद आया… अपनी अलमारी खोल कर वो कुछ खोजने लगी… ख़ुशी में या जल्दी में पता नहीं पर … सामान बहार गिर रहा था… मैंने उनके सामान को उठाते हुवे पुछा …. क्या गुम हो गया गुरु …. (अक्सर में उन्हें गुरु या बॉस बुलाता हूँ )
“रुक जाओ” .. क्या आग लगी है.. ठहरो…! फिर एक लिफाफा उन्होंने निकला… हाँ ये है… चलो अब सारा सामान वापस अलमारी में रख दो….
मुझे पता नहीं चल रहा था केसे या कहाँ नीचे गिरा सामान रखना था … उनको जैसे वो सिर्फ लिफाफा चाहिए था.. बाकी दुनिया गई भाड़ में…
रूम में एक छोटा सा फ्रिज था.. उस तरफ जाते हुवे बोली … “अरे रख दो कहीं भी” फिर उन्होंने फ्रिज से मेरे लिए एक कोल्ड ड्रिंक निकाली और बोली….अब चलो… तुम्हे अपना एरिया दिखाती हूँ…

पहले वो मुझे अपने डाइनिंग रूम में ले गयी जहाँ पर दस पंद्रह लोगो के बेठने की जगहा थी.. एक बड़ा टीवी लगा था और कार्नर की एक टेबल की तरफ इशारा करके बोली… में वंहा बैठ कर खाना खाती हूँ.. मुझे वो जगह बहुत अच्छी लगती है ! अपने अटेंडेंट की और स्टाफ की वो खूब तारीफ़ कर रही थी.. कितने अच्छे लोग हैं.. में बता नहीं सकती ..बहुत ख़याल रखते हैं ! एक राउंड मार कर हम बाहर ओपन एरिया में गए… बैठेन के लिए वंहा बहुत सी टेबल्स और चेयर्स थी.. !

असमान में हलके बादल थे पर धूप अच्छी खिली थी !
सबसे पहले उन्होंने वो लिफाफा निकला और कहा की यह आपका बर्थडे गिफ्ट है… उस समय पहुंचा नहीं पाई.. हॉस्पिटल जाना पड़ा लेकिन संभाल कर रखा था के कभी मिलूंगी तो दूंगी ! एक बर्थडे कार्ड और एक पेन उस लिफाफे में था.. मेरा दिल भर आया लेकिन.. ज़ाहिर नहीं होने दिया… कार्ड पर कुछ शरो शायरी थी.. शेर पढ़े और दोनों ने …खूब वाह वाह किया …एक शेर बहूत पसंद आया…. हमने उसी वक़्त ट्वीट भी कर दिया…

“थक कर ना बैठ तू .. उड़ान बाकी है
ज़मीं ख़त्म हो गई….तो आसमान बाकी है”

मैं ट्वीट करने में बिजी था …वो फिर अंदर गई और एक काफी और चाय लेकर बाहर आई… “लो जी चाय पियो”…. चाय का समय है… और साथ में वो अपनी ऑटोग्राफ बुक ले कर आई…बड़े जोश से उन्होंने बताया..किन किन लोगों से वो मिली हैं…. राजेश खन्ना और बहुत सारे कलाकारों और पॉलिटिशियन के ऑटोग्राफ से भरा था वो बुक….. एक पन्ने पर मेरा नाम और फ़ोन नंबर लिखा था… नीचे खाली जगह के तरफ इशारा करके बोली.. यहाँ पर कुछ अपने हाथ से लिखो ! हमने भी जो दिल में आया वो लिख डाला..
उनकी अपनी कविताओं का एक पुलिंदा उनोहने मुझे दिया और कहा … यह तुम्हारे लिए है…अपने रेडियो शो में पड़ना अगर अच्छी लगे… और कुछ अभी पड़ कर सुनाओ…मैंने उनकी दो तीन कवितायेँ पडी और चार पांच शेर मारे.. खूब सारे बातें कीं…वो अपने बारे में आसपास के लोगों के बारे में बहुत बात कर रही थी… कह रही थी…तीन शब्दों का यहाँ बहुत इस्तेमाल होता है और वो है.. डार्लिंग…..मोंम और थैंक्यू….नर्सिंग होम में उनको नया नाम भी मिला हे… “पॉकेट राकेट”.. फिर अपने ही नाम पर एक ज़बरदस्त ठहाका लगाया….स्टाफ से वो बहुत ख़ुश थी

फिर हमने नर्सिंग होम के चारो तरफ एक वाक की…उनके पास बहुत सारे बातें थी ….
कमबख्त मेरा फ़ोन बार बार बज रहा था….. वो बोली… गुरु तुम्हरा फ़ोन बोल रहा हे की चलो …
बाहर गेट तक मुझे छोड़ने आई….और बोली…. आज उनको डबल खुशी मिली है… पहली मेरे साथ गपशप का समय और दूसरी शाम को उनका बेटा उनको लेने आ रहा है… वीकेंड वो बेटे के परिवार के साथ रहेंगी
आते हुवे उनसे पूछा “कुछ चाहिए … अगली बार लेता आऊँगा !
वो बोली “मुझे कुछ नहीं चाहिये “ सिर्फ इंसानों से बात करनी है … ( वो लगभग 150 लोगों के बीच रहती है )
फिर मिलने का वादा करके में वंहा से चल पड़ा…

उनेक ऑटोग्राफ बुक पर मैंने लिखा था…
“आपकी जिंदादिली को सलाम करता हूँ….उपर वाला दुनिया में खुशियाँ बाटने वाले बहुत कम लोगों को बनाता है और आप उनमे से एक हो… यूँ ही खुशियाँ बांटते रहें”
मुझे पूरा विश्वास है के जहाँ भी वो जाती है.. एक एनर्जी… मुस्कुराहट… और ज़िन्दादिले लेकर जाती है

वैसे तो उनकी कविताओं बहुत बढ़ियाहै पर ये एक कविता जो उन्होंने अपने बेटे के बर्थडे पर लिखी है ..कमाल की है….

अनमोल सब से माँगा था रब से
माँगी थी दुवा रब से , देना मुझे जो अलग हो सब से ..
दिया मुझको नन्हा मुन्ना कन्हिया
मेरी जीवन की नैया का खिवैया
और कहा लो संभालो इसे, अनमोल है ये सब से ..
देकर ये प्यारा सा उपहार मुझ पर किया उसने उपकार
ए मेरे गुलज़ार के मासूम नन्हे पौधे… देख तुझे गद्द गद्द हो जाती हूँ
मेरी उम्र भी लग जाये तुझको, फूलों सा खिले बहारों में
ग़मों की धुप में जाना ना पड़े, पलकों को कभी भिगोना ना पड़े
बिन मांगे मिले सब कुछ, दुआ के लिए हाथ उठाना ना पड़े
जब भी यह फडफडाता हुवा पंछी उड़ जायेगा
तो यही दुआओं का कारवां.. मशाल बन कर तुझे सन्मार्ग दिखाएगा

Rajesh Thakur

Tune India Radio Sydney Australia

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